ग़ज़लों के बादशाह कहे जाने वाले मिर्जा गालिब बिना साज़ संगीत के अनायास हीछोड़ देते थे उसे आजकल के गायक आधुनिक साजों से लैस होकर भी ग़ज़ल के नाम पर मखौल भर कर बैठते है।ग़ज़ल गायिकी के फनकार बहुत है, पर जब ग़ज़ल में जान ही न हो तो गायिकी बेअसर रहती है। गायक उसे श्रोता के कान तक तो पहुँचा सकताहै पर ज़हन तक नहीं।
ग़ज़लों के एक दौर में लिखी गई हर कामयाब ग़ज़ल दिल से लिखी जाती थी और दिल तक पहुँचती थी।ग़ज़ल एक भाव है जो तब तक दिल तक नहीं पहुंचेगा जब तक दिल से नहीं निकलेगा।
मैंने इस ब्लॉगके माध्यम से यह कौशिश की गई है की ऐसी ही सच्ची ग़ज़लों की खोज इतिहास के पन्नो में की जाए । ऐसी कईमहान कृतियाँ जिनपर समय की धूल चढ़ बैठी है उन्हें ढूँढना होगा । इस ब्लॉग में मेरी यह कोशिस रहेगी की ऐसीग़ज़लें ढूंढी जाए और उनका फ़िर से लुत्फ उठाया जाए ।
यह एक श्रधांजलि होगी हर एक शायर को जिनकी ग़ज़लें जीने से पहले ही गर्त हो गई. मुझे विश्वास है वोह फ़िर से जी उठेगी । आप से अनुरोध है इन ग़ज़लों के दौर में मेरे साथ चलें ।कोई ग़ज़ल आप को पसंद हो तो उसे मुझे भेजें ताकि मैं उसे यहाँ शामिल कर लाखों लोगो तक पहुँचा सकूं।
Thursday, October 23, 2008
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